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स्टालिन सरकार का हिन्दी की ओर कदम, क्या राजनीति में दौड़ती हिन्दी बदलेगी स्टालिन सरकार का सफर?

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (द्रमुक) की पूरी राजनीति जिस हिन्दी के विरोध में आगे बढ़ी, उसी द्रमुक सरकार का अब हिन्दी में विज्ञापन जारी करना क्या मामूली बात है? तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने अपनी उपलब्धियों को लेकर उत्तर भारत के कुछ बड़े हिन्दी अखबारों में पूरे पृष्ठ का विज्ञापन जारी किया था। जिस द्रमुक सरकार की पूरी राजनीति ही हिन्दी के विरोध में आगे बढ़ी है, उसी हिन्दी में द्र्मुक सरकार का विज्ञापन जारी करना कोई मामूली बात नहीं है। द्रमुक ने अपने राजनीतिक सफर में बहुत सारी उपलब्धियां हासिल की हैं। तमिलनाडु की जनता की नजर में द्र्मुक सरकार की कामयाबी हिन्दी विरोध को उस चरम पर पहुंचाना भी रहा है, जहां से पीछे लौट पाना बिल्कुल भी आसान नहीं था।

हिन्दी को 26 जनवरी, 1965 के दिन से राजभाषा के तौर पर पूरी तरह स्थापित होना किया जाना था लेकिन वह द्रविड़ की राजनीति थी, जिसने तब गणतंत्र दिवस के सम्मानवश 26 जनवरी के बजाय एक दिन पहले यानी 25 जनवरी को पूरे तमिलनाडु को हिन्दी-विरोधी काले झंडों से भर दिया था। उसके बाद हिन्दी को राजभाषा का असल स्थान देना टल गया।

स्टालिन सरकार का हिन्दी की ओर नया कदम

स्टालिन सरकार के इस कदम पर हैरान होने की कई वजह सामने आती हैं। भारतीय राजनीति की समाजवादी धारा हिन्दी की घोर समर्थक रही है। स्टालिन सरकार हमेशा हिन्दी को लेकर काफी आक्रामक रही है। अगस्त, 2020 में भी नई शिक्षा नीति के बहाने स्टालिन की सरकर ने हिन्दी के खिलाफ हमला बोला था। शायद अब स्टालिन सरकार भी समझ रही है कि उत्तर भारत में अगर अपनी छवि बनानी है, तो हिन्दी ही एकमात्र सहारा है । शायद ये तमाम कारक हैं, जिन्होंने स्टालिन सरकार को मामूली स्तर पर ही सही, अपना नजरिया बदलने को मजबूर किया है। हम सभी को इसका स्वागत करना चाहिए।

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